लेखिका – नेहा वर्मा
सहयोगी – जो हंटर
शाम को जो ने सभी को जगाया और कॉफी पिलायी। समय देखा तो ५ बज रहे थे। हम सभी फ्रेश हो गये थे सो अब बीच पर दुबारा पहुँच गये। सभी ने स्वीमिंग सूट पहन लिए थे। मैं और लता कम कपडों में थी उसका फ़ायदा जो और विक्रम दोनों ही उठा रहे थे। जो तो पहले से ही मुझ पर मरता था। पर दिखाता ऐसे था कि जैसे सिर्फ़ दोस्त ही हो। वो मेरे शरीर के एक-एक अंग का भरपूर जायज़ा लेता था। मैं भी कपड़े ऐसे ही पहनती थी जिसमें जो मेरे उभार, कटाव और गहराईयों को नाप सके। आज फिर उसे मौका मिल गया। विक्रम और लता तो लहरों में खेलने लगे और मेरा पार्टनर जो बन गया। आज हम कुछ ज्यादा ही मस्ती कर रहे थे। एक दूसरे को छेड़ भी रहे थे। कुँवारेपन का मजा बहुत ही रोमांटिक होता है।
लहरें बढ़ने लगी थी… पानी का उछाल भी बढ़ रहा था। आकाश भी बादलों से ढक गया था। सुरक्षा गार्ड ने आगाह कर दिया कि अब बीच छोड़ दो… शाम ढलने लगी थी। हमने वापस लौटने का विचार किया। बादल चढ़ आए थे, किसी भी वक्त पानी बरस सकता था। हम लोग जल्दी से सामने वाले होटल में पहुँचने की कोशिश करने लगे। बूँदा-बाँदी शुरू हो चुकी थी… होटल में पहुँचते ही बरसात तेज़ होने लगी। जो ने कहा कि बरसात बन्द हो तब तक सभी लोग खाना खा लेते हैं। हमें जो का सुझाव पसन्द आया। डिनर करके जो ने बाहर का जायज़ा लिया तो बरसात तेज़ हो रही थी। होटल के मालिक ने जो को चाबी ला कर दे दी और कुछ समझाया।
जो ने कहा,”आज तो यहीं सोना पड़ेगा। रास्ता भी बन्द हो गया है…
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