लेखिका – दिव्या डिकोस्टा

ऐसी ही एक रात थी… मैं छत पर टहल रही थी। रवि अपने दोस्त के साथ था। मेरे बारे में उन्हें नहीं पता था कि मैं रात को अक्सर छत पर टहलती हूँ। मैंने यूँ ही एक बार खिड़की से उसके कमरे में झाँका। रवि और उसका दोस्त कमल नीचे बैठे दारू पी रहे थे। सामने टीवी चल रहा था। पाजामे में से रवि का लण्ड खड़ा साफ़ ही दिख रहा था। कमल उसे बार-बार देख रहा था। अचानक मैं चौंक गई। कमल का हाथ धीरे से रवि की जाँघ पर आया और धीरे से उसके लण्ड की तरफ़ आ गया। रवि ने तिरछी नज़रों से उसके हाथ को देखा, पर कहा कुछ नहीं। अब कमल का हाथ उसके लण्ड पर था। रवि के जिस्म में थोड़ी कसमसाहट हुई। कमल ने अब उसका लण्ड अपने हाथों से दबा दिया। रवि ने उसकी कलाईयाँ पकड़ लीं पर लण्ड नही छुड़ाया।

“रवि कैसा लग रहा है…?”

“हाय… बस पूछ मत… दबा यार और दबा !” रवि ने भी अपना हाथ उसके लण्ड की तरफ़ बढ़ा दिया। रवि ने भी उसका लण्ड पकड़ लिया। अब दोनों एक दूसरे का लण्ड दबा रहे थे और धीरे-धीरे मुठ्ठ मार रहे थे। मेरे दिल की धड़कन बढ़ने लगी… ये क्या कर रहे हैं… क्या होमो कर रहे हैं…।

तभी कमल ने पाजामे का नाड़ा खोल दिया और रवि का लण्ड बाहर निकाल लिया। हाय रे… इतना बड़ा लण्ड…! मेरा जी धक् से रह गया। मेरा मन वहाँ से हटने को नहीं कर रहा था।

कमल ने धीरे से रवि के सुपाड़े की …

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