एक माँ अपने पाँच साल के बच्चे के साथ चिड़ियाघर जाती है। वहाँ वे हाथी के पिंजरे के पास पहुँचते हैं। बच्चा आश्चर्य से इस विशालकाय जीव को देखता है और अपनी माँ से पूछता है, “हाथी से वह लम्बी सी लटकती हुई चीज़ क्या है?”

उसकी माँ उत्तर देती है “वह उसकी सूँढ़ है बेटे।”

बच्चा फिर पूछता है, “मुझे पता है, नही इस तरफ लटकने वाली चीज़ नहीं, दूसरी ओर जो लटक रहा है, वह क्या है?”

माँ उत्तर देती है “ओह, वह तो उसकी पूँछ है।”

बच्चा फिर पूछता है, “मुझे वह भी पता है! उसकी सूँढ़ और पूँछ के बीच जो चीज़ लटक रही है, वह क्या है?”

माँ इस बात को वहीं खत्म करना चाहती है, अतः कहती है “ओह, वो तो कुछ भी नहीं है” और उसे लेकर वहाँ से आगे बढ़ जाती है।

दो सप्ताह को बाद बच्चा अपने पिता के साथ चिड़ियाघर जाता है। वे दोनों हाथी के पिंजरे के पास पहुँचते हैं। वह अपने पिता से पूछता है “पिताजी हाथी से क्या लटक रहा है?”

पिता उत्तर देते हैं, “वह उसकी सूँढ़ है।”

“नहीं उसके पीछे वाली चीज़!” बच्चा कहता है।

“ओह, वो तो पूँछ है उसकी” पिता ने उत्तर दिया।

“नहीं, सूँढ और पूँछ के बीच!” बच्चा चिल्ला कर पूछता है।

उसके पिता उत्तर देते हैं, “बेटे, वह हाथी का लिंग है।”

बच्चा थोड़ा प्रश्नवाचक मुद्रा में अपने पिता से कहात है, “पर माँ तो कह रही थी कि वह कुछ भी नहीं है।”

उसके पिता ने उत्तर दिया, “बेटे, वह तो इसलिए कि इसी चीज से उसकी ऐसी की तैसी होती आई है।”