प्रेषक : प्रेम गुरु
अनु हमारे यहाँ झाडू पोंछा बर्तन सफाई कपड़े आदि सब काम करती थी। कभी कभी रसोई में भी मदद करती थी। वो तो यही चाहती थी कि किसी तरह यहीं बनी रहे। मैं शुरूआत में जल्दी नहीं करना चाहता था।

जब वो ड्राइंग रूम में झाडू लगाती तो उसके रसभरे संतरे ब्लाउज के अन्दर से झांकते साफ़ दिख जाते थे। पर निप्पल और एरोला नहीं दिखते थे पर उसकी गोलाइयों के हिसाब से अंदाजा लगना कहाँ मुश्किल था। मेरा अंदाजा है कि एक रुपये के सिक्के से ज्यादा बड़ा उसका एरोला नहीं होगा। सुर्ख लाल या थोड़ा सा बादामी। उसकी घुंडी तो कमाल की होगी।

मधु के तो अब अंगूर बन गए है और चूसने में इतना मज़ा अब नहीं आता। पता नहीं इन रस भरे आमों को चूसने का मौका कब नसीब होगा। शुरू शुरू में मैं जल्दबाजी से काम नहीं लेना चाहता था। अनु इन सब से शायद बेखबर थी।

आज शायद उसने मधु की दी हुई ब्रा पहनी थी जो उसके के लिए ढीली थी। झाडू लगाते हुए जब वो झुकी तो मैंने देख लिया था। मेरी नज़रें तो बस उन कबूतरों पर टिकी रह गई। मुझे तो होश तब आया जब मेरे कानों में आवाज आई, “साहब अपने पैर उठाओ…
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